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अष्टयाम अर्थात चौबीसों घंटे चलने वाली प्रक्रिया।इस वेबसाइट पर उपलब्ध होनेवाली हर सामग्री- वीडियो, विचार एवं लेखों का एक ही लक्ष्य है- आपको शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक रूप से सबल बनाना।हर क्षण, हर समय आपको सकारात्मक चिंतन के लिए प्रेरित करना। 

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तुलसीदास: भारत के महान संत Tulsidas: The Great Sage of India

तुलसीदास जी का एक चित्र जिसे गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तक से लिया गया है। यहां उनके बैठने की मुद्रा पर ध्यान दीजिए!  दोस्तों, आज हम बात करेंगे भक्तकवि तुलसीदास जी के बारे में। उनकी रचनाओं हनुमानचालीसा और रामचरितमानस को हर दिन करोड़ों लोग पढ़ते और सुनते हैं। वह भारतीय संस्कृति के आधारभूत स्तंभों में एक हैं। इतिहास कहता है, तुलसीदास जी बिल्कुल साधारण परिवार से थे। जन्म के तुरंत बाद ही मां- बाप से वंचित हो गए। किसी तरह जीवन चला। युवा होने पर धार्मिक कथावाचक बने। आज के इस लेख में हम उन घटनाओं और परिस्थितियों को देखेंगे जिन्होंने एक साधारण कथावाचक को इतिहास का सबसे बड़ा भक्तकवि बना दिया! खुद तुलसीदास जी के शब्दों में- " घर घर मांगे टूक पुनि, भूपति पूजे पाय। जे तुलसी तब राम विमुख, ते अब राम सहाय" " मतलब?" " जब राम का ज्ञान नहीं था, तो घर घर भीख मांगकर खाना पड़ता था। जब से राम का ज्ञान हुआ है, राजा लोग भी मेरे पैर दबाने लगे हैं" आइये, शुरू से देखते हैं। तुलसी का जन्म अति साधारण परिवार में हुआ।दुखद स्थितियों में हुआ।जन्म के दूसरे ही दिन माता हुलसी का...

आइये, समझें वैदिक शिक्षा प्रणाली को: Let us understand Vedic Education System

दोस्तों, विश्वास है आप सभी सकुशल और सानंद हैं। आज हम यौगिक मनोविज्ञान के ऊपर आधारित प्राचीन गुरुकुलों की शिक्षा पद्दति पर बात करेंगे और देखेंगे कि इसे आधुनिक शिक्षा पद्दति में शामिल करके कैसे विद्यार्थियों के लिए सर्वोत्तम परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। आइये, शुरू करें। श्रीरामचरितमानस की एक चौपाई है- "गुरु गृह गए पढन रघुराई, अल्प काल विद्या सब पाई"। "मतलब?" " जब रघुनाथ जी गुरु के घर अर्थात गुरुकुल पढ़ने गए तो उन्होनें अल्प काल में ही सारी विद्याएं प्राप्त कर लीं।" अत्यधिक कम समय में ही शास्त्र और शस्त्र विद्याओं में पारंगत होने का ही प्रभाव था कि रघुनाथ जी महर्षि विश्वामित्र की नजरों में आये। उन्हें महर्षि ने अपने आश्रम की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा और आगे जाकर अपनी युद्धकला भी सिखाई। महर्षि वशिष्ठ का सम्पूर्ण शास्त्रज्ञान और महर्षि विश्वामित्र का सम्पूर्ण शस्त्रज्ञान श्रीराम में समाहित हो गया। इस तरह वह इस पृथ्वी के तीसरे ऐसे व्यक्ति बने जो शास्त्र और शस्त्र इन दोनों ही क्षेत्रों में चरम सीमा का ज्ञान रखते थे। उनके अलावा अन्य दो व्यक्ति थे- परशु...

निःस्वार्थ सेवा: शक्ति का स्त्रोत Selfless service : Source of Innerpower

मित्रों, आज हम श्रीरामचरितमानस का एक सूत्र लेंगे और उसमें निहित योगविज्ञान के सिद्धांत को समझेंगे। आज इस सूत्र के माध्यम से हम इस बात को समझेंगे कि हर धर्म में असहायों एवं दुखियों की मदद करने की बात क्यों कही गयी है।योगविज्ञान के इस सिद्धांत से हम इस बात को भी समझेंगे की कैसे किसी असहाय को की गई मदद अन्ततः कई गुना बनकर हमें ही मिल जाती है! आइये, शुरू करते हैं। हम बचपन से ही सीखते आये हैं। दुखियों एवं असहायों की मदद करो। दुनिया के सारे धर्मों में ये बात मिलती है। आज हम एक सवाल लेते हैं! आखिर यह सीख क्यों दी जाती है? इसका आधार क्या है? किसी दुखी एवं लाचार की मदद हमें क्यों करनी चाहिए? चलिए, उत्तर ढूंढते हैं। श्रीरामचरितमानस का एक सूत्र है-                   " गिरा अरथ जल बीचि सम                     कहियत भिन्न न भिन्न                     बंदउ सीता राम पद               ...