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योग और वैज्ञानिक सोच: Yoga and Scientific Thinking

दोस्तों, आज हम एक अति महत्वपूर्ण विषय पर बात करेंगे। योगविज्ञान के एक जटिल सिद्धांत को समझेंगे जो हमारे जीवन में बहुत उपयोगी है। यह कई प्रकार की समस्याओं से हमें बचाता है। आइये, एक कहानी से शुरू करें जो भगवान बुद्ध से जुड़ी है। भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। जहां भी जाते, भीड़ जुट जाती! लोग उनके उपदेशों को सुनकर कृतार्थ होते। उस वक़्त एक परंपरा थी। साधु- महात्मा लोग गृहस्थों के यहां भिक्षा मांगकर भोजन करते थे। यह परंपरा हम आज भी भारत के कुछ क्षेत्रों में देख सकते हैं। भगवान बुद्ध के कुछ शिष्य भिक्षा मांगने एक नगर में पहुंचे। वहां एक विचित्र घटना देखने को मिली। नगर के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने एक बहुत ऊंचा खंभा गड़वाकर शिखर पर एक थैली रखवाई थी। घोषणा थी कि जो भी व्यक्ति उस खंभे पर चढ़कर थैली उतारेगा, उसे ढेर सारा इनाम मिलेगा। बहुतों ने कोशिश की! पर सफल कोई नहीं हुआ। लोगों ने भिक्षुओं से आग्रह किया कि योगबल से उस खंभे पर चढ़कर थैली उतारें और उस व्यक्ति का गर्व चूर करें! लोगों का मानना था कि ये असंभव सा कार्य कोई सिद्ध योगी ही कर सकता है। दोस्तों, अब थोड़ा रुकिए। ...

अयोध्या: हमारे गौरव की भूमि Ayodhya: The Land of Pride

अयोध्या में नवस्थापित मूर्ति!  मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम और उनके प्रिय भक्त हनुमानजी के चेहरे के भावों को देखिए! ये भाव भंगिमा बहुत कुछ कहती है! Hint के तौर पर इतना बता देता हूँ कि हनुमानजी की मूर्ति वीरासन में बनाई गई है।  दोस्तों, विश्वास है आप सभी स्वस्थ और सानंद हैं। कुछ दिन पहले मुझे अयोध्या जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हिन्दू धर्म में सात नगरों को सबसे अधिक पवित्र और महत्वपूर्ण कहा गया है। इनमें अयोध्या प्रथम स्थान पर आता है।इसे तीर्थरूपी विष्णु का मस्तक कहा गया है! श्रीरामचन्द्रजी का यह नगर आदिकाल से ही भारतीयों की आस्था का केंद्र रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तथा गुजरात से अरुणाचल तक के लोग यहां आकर पुण्यलाभ करते हैं। जो भी दिल में श्रद्धा लेकर यहां आता है, वह रामजी का ही हो जाता है! यहां के वातावरण में व्याप्त रामभक्ति की तरंगें उसके सारे कष्टों को दूर करके उसमें नई ऊर्जा भर देती हैं। मित्रों, आज हम इसी परम पावन अयोध्या नगरी के इतिहास को अच्छे से जानेंगे। एक समय यह नगर भारत की समृद्धि, सभ्यता और ज्ञान का केंद्र था। इसके बाद इसपर एक के बाद एक आक्रमण हुए और यह...

जटायु: एक अप्रतिम नायक Jatayu: An Unmatched Hero

दोस्तों, आज हम श्रीरामचरितमानस पर अपनी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। कहते हैं, रामकथा में मानव की सारी समस्याओं के समाधान छिपे हैं। महात्मा गांधी सहित अनेक भारतीय और विदेशी महापुरुषों, विद्वानों तथा विचारकों ने रामराज्य की अवधारणा को प्रशासन का सर्वोत्तम रूप माना है जो रामकथा में वर्णित सिद्धान्तों पर आधारित है। रामकथा में एक महत्वपूर्ण पात्र है जटायु। वृद्ध लेकिन बलशाली। पद से राजा लेकिन मन से संन्यासी! अधर्म का विरोध करते हुए अपने प्राण देनेवाला कर्मयोगी! जटायु का जन्म एक विख्यात वंश में हुआ था। उनके पिता अरुण भगवान सूर्य के सारथी थे। शिक्षा पूरी होने के बाद उन्हें पंचवटी एवं नासिक क्षेत्र में निवास करने वाली एक जनजाति का अधिपति बनाया गया जिसका प्रतीक चिन्ह गिद्ध था। इस कारण से उन्हें गिद्धराज जटायु भी कहा जाता है। दोस्तों, यहाँ एक सवाल लेते हैं। फिल्मों और धारावाहिकों में तो जटायु को पक्षी दिखाया गया है!उन्हें गिद्ध बताया गया है। तो क्या जटायु एक पक्षी थे? नहीं दोस्तों, बिल्कुल नहीं। यह एक भ्रम मात्र है। वास्तव में जटायु एक जनजातीय राजा थे। उनका प्रतीक चिन्ह गिद्ध था। जिस तरह ...

परशुराम: एक जननायक Lord Parshuram: A Legendary Hero

आज बात करते हैं, परशुराम के बारे में। इनका व्यक्तित्व बड़ा ही विलक्षण है! हजारों युग आए और गए! लेकिन इनकी कथा हर समय कही- सुनी जाती रही है! इन्हें चिरंजीवी भी कहा जाता है क्योंकि इनकी लोकप्रियता और व्यक्तित्व समय और काल से परे रहे हैं। हर युग में इनकी उपस्थिति मानी गयी है। परशुराम अपने समय के सबसे बड़े विद्वान ऋषियों में थे। लेकिन एक अनूठी बात थी! वो अपने समय के सबसे बड़े योद्धाओं में भी गिने जाते थे। शास्त्र और शस्त्र का यह संगम और किसी में आज तक नहीं देखा गया! हमेशा युद्ध के लिए उत्सुक रहने वाला यह परम क्रोधी ब्रम्हज्ञानी ऋषि तत्कालीन जनता के लिए श्रद्धा  का एवं तत्कालीन राजाओं के लिए भय का विषय था! जब जब राजाओं ने उनसे टक्कर ली, विनाश को ही प्राप्त हुए! प्रमाणों के अनुसार, वे आरंभिक जीवन में बड़े सरल, विनम्र करुणाशील एवं अंतर्मुखी युवा थे! ब्रम्हज्ञान की धुन में लीन यह युवा आश्रम की भीड़ का ही एक हिस्सा था! दोस्तों, आज हम इन्हीं परशुरामजी के विषय मे चर्चा करेंगे। देखेंगे, आखिर वो कौन सी परिस्थितियां थीं, जिन्होंने एक सीधे सरल छात्र को युग का सबसे अजेय योद्धा बना दिया! इतन...

निःस्वार्थ सेवा: शक्ति का स्त्रोत Selfless service : Source of Innerpower

मित्रों, आज हम श्रीरामचरितमानस का एक सूत्र लेंगे और उसमें निहित योगविज्ञान के सिद्धांत को समझेंगे। आज इस सूत्र के माध्यम से हम इस बात को समझेंगे कि हर धर्म में असहायों एवं दुखियों की मदद करने की बात क्यों कही गयी है।योगविज्ञान के इस सिद्धांत से हम इस बात को भी समझेंगे की कैसे किसी असहाय को की गई मदद अन्ततः कई गुना बनकर हमें ही मिल जाती है! आइये, शुरू करते हैं। हम बचपन से ही सीखते आये हैं। दुखियों एवं असहायों की मदद करो। दुनिया के सारे धर्मों में ये बात मिलती है। आज हम एक सवाल लेते हैं! आखिर यह सीख क्यों दी जाती है? इसका आधार क्या है? किसी दुखी एवं लाचार की मदद हमें क्यों करनी चाहिए? चलिए, उत्तर ढूंढते हैं। श्रीरामचरितमानस का एक सूत्र है-                   " गिरा अरथ जल बीचि सम                     कहियत भिन्न न भिन्न                     बंदउ सीता राम पद               ...

त्रिजटा: राक्षसी से देवी तक Trijata: From demon to Goddess

दोस्तों, आज हम बात करेंगे त्रिजटा के बारे में। रामायण का यह एक ऐसा पात्र है जिसकी चर्चा बहुत कम होती है। त्रिजटा को सीताजी ने बड़े प्रेम से मां कहा था। यह सौभाग्य और किसी को कभी नहीं मिला! सीताजी ने त्रिजटा से न केवल अपनी व्यथा सुनाई, बल्कि चिता जलाने के लिए मदद भी मांगी!त्रिजटा ने समझाया और मनाया।ठीक उसी तरह जैसे एक मां अपनी बेटी को डांटकर प्रेम से समझाती है।ये अवसर भी किसी और को नहीं मिला! दोस्तों, श्रीराम को अवतार और सीताजी को उनकी शक्ति बताया गया है। परमशक्ति भी किसी से सहायता मांग बैठे, यह प्रसंग आपको कहीं नहीं मिलेगा! ऐसे वर्णन मिलते हैं कि त्रिजटा एक राक्षसी थी! रावण की सेविका थी! लेकिन बाद में उसका एक आदर्श स्वरूप देखने को मिलता है! दोस्तों, आज के इस लेख में हम उन घटनाओं एवं परिस्थितियों को देखेंगे जिन्होंने एक साधारण सेविका को रामकथा में एक बहुत ऊंचे और श्रद्धेय स्थान की अधिकारिणी बनाया। आईए, शुरू करते हैं। त्रिजटा के पूर्वज शुरू से ही लंका राज्य के सेवक रहे थे। त्रिजटा ने भी कुलपरंपरा के अनुसार रावण की सेवा की। वृद्धा वस्था आने पर उसे एक आरामदायक और सम्मानित पद...

तुलसीदास: भारत के महान संत Tulsidas: The Great Sage of India

तुलसीदास जी का एक चित्र जिसे गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तक से लिया गया है। यहां उनके बैठने की मुद्रा पर ध्यान दीजिए!  दोस्तों, आज हम बात करेंगे भक्तकवि तुलसीदास जी के बारे में। उनकी रचनाओं हनुमानचालीसा और रामचरितमानस को हर दिन करोड़ों लोग पढ़ते और सुनते हैं। वह भारतीय संस्कृति के आधारभूत स्तंभों में एक हैं। इतिहास कहता है, तुलसीदास जी बिल्कुल साधारण परिवार से थे। जन्म के तुरंत बाद ही मां- बाप से वंचित हो गए। किसी तरह जीवन चला। युवा होने पर धार्मिक कथावाचक बने। आज के इस लेख में हम उन घटनाओं और परिस्थितियों को देखेंगे जिन्होंने एक साधारण कथावाचक को इतिहास का सबसे बड़ा भक्तकवि बना दिया! खुद तुलसीदास जी के शब्दों में- " घर घर मांगे टूक पुनि, भूपति पूजे पाय। जे तुलसी तब राम विमुख, ते अब राम सहाय" " मतलब?" " जब राम का ज्ञान नहीं था, तो घर घर भीख मांगकर खाना पड़ता था। जब से राम का ज्ञान हुआ है, राजा लोग भी मेरे पैर दबाने लगे हैं" आइये, शुरू से देखते हैं। तुलसी का जन्म अति साधारण परिवार में हुआ।दुखद स्थितियों में हुआ।जन्म के दूसरे ही दिन माता हुलसी का...